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सरसों की कच्ची खल: प्रोटीन से भरपूर किफायती दाम में पशुओं के लिए पोषण संपूर्ण

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  अधिकतर पशुपालक किसान भाइयों के लिए सरसों की खल एक परिचित और महत्वपूर्ण पशु आहार है। यह विशेष तौर पर दुधारू पशुओं जैसे गाय और भैंस के लिए बेहद लाभकारी होती है। सरसों की खल, प्रोटीन और फैट का किफायती एवं विश्वसनीय स्रोत है, जो पशुओं की पोषण सबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने में मदद करती है। यह किफायती होने के साथ-साथ पूरे साल उपलब्ध रहती है, जिससे यह किसानों के लिए पशु आहार का एक प्रमुख विकल्प बन जाती है। सरसों की खल के प्रमुख लाभ: सरसों की खल में लगभग 33-34% प्रोटीन और 9-10% तक फैट होता है, जो इसे अन्य खलों के मुकाबले अधिक पौष्टिक और किफायती बनाता है। प्रोटीन का यह उच्च स्तर पशुओं के स्वास्थ्य, दूध उत्पादन और प्रजनन में सुधार करने में मदद करता है। हालांकि, कई बार किसान भाई सरसों की खल में झल (तीक्ष्ण गंध/pungent odor) होने के कारण पशु इसे थोड़ी देर तक कम खाते हैं। इस समस्या को दूर करने के लिए पशुपालक सरसों की खल में थोड़ा चने की चूरी मिलाकर खिला सकते हैं, चने की चूरी की महक के साथ पशु इसे खा लेते हैं लेकिन याद रहे कि झल वाली खल में तेल अधिक होता है। सरसों की खल: क्यों है यह किफायती ...

जानलेवा और लक्षणहीन: दुधारू पशुओं में कीटोसिस रोग से बचाव

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दुधारू पशुओं में होने वाली कीटोसिस बीमारी एक गंभीर मेटाबोलिक बीमारी है जो अक्सर ब्यात के पहले 2 महीने में होती है। यह बीमारी अक्सर लक्षणहीन होती है, जिससे पशुपालकों के लिए इसका पता लगाना मुश्किल हो जाता है। यदि समय पर इसका इलाज न किया जाए, तो यह पशु के स्वास्थ्य, दूध उत्पादन और यहां तक ​​कि जीवन के लिए भी खतरा पैदा कर सकती है। कीटोसिस के लक्षण: जैसा कि पहले बताया गया है, कीटोसिस के शुरुआती लक्षण अक्सर सूक्ष्म होते हैं और पशुपालकों द्वारा इसे पता लगा पाना बेहद मुश्किल होता है। इनमें शामिल हैं: पशु का धीरे-धीरे चारा खाना कम करना दूध उत्पादन में गिरावट वजन कम होना पशु का तेज़ी से वजन कम होना दूध उत्पादन में भारी गिरावट चलने में लड़खड़ाहट केवल खुर चाटना कीटोसिस के कारण: कीटोसिस ऊर्जा की कमी के कारण होता है। ब्यात के बाद, दुधारू पशु भारी मात्रा में दूध का उत्पादन करते हैं, जिसके लिए उन्हें भारी मात्रा में ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यदि उन्हें पर्याप्त ऊर्जा नहीं मिल पाती है, तो उनका शरीर वसा को ऊर्जा स्रोत के रूप में उपयोग करना शुरू कर देता है। यह वसा (फैट) टूटने की प्रक्रिया, जिसे कीटोसिस ...

सेक्सड सीमेन: डेयरी फार्म के शीघ्र विस्तार लिए एक वरदान

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भारत का डेयरी उद्योग वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण योगदान देता है, जिसमें लगभग 24% दूध उत्पादन भारत से आता है। भारत में लगभग 30 करोड़ पशु हैं, और इन पशुओं से अधिकतम उत्पादन प्राप्त करने के लिए नए और आधुनिक तरीकों का उपयोग किया जा रहा है। इसी क्रम में सेक्स्ड सीमेन (sexed semen) एक उभरता हुआ तकनीकी नवाचार है जो डेयरी फार्मिंग में क्रांति ला रहा है। सेक्सड सीमेन क्या है? सेक्सड सीमेन एक विशेष प्रकार का सीमेन है जिसमें शुक्राणुओं को उनके लिंग गुणसूत्र (X या Y) के आधार पर अलग कर दिया जाता है। पारंपरिक वीर्य में X और Y दोनों प्रकार के शुक्राणु होते हैं, जिसके परिणामस्वरूप मादा (X) या नर (Y) बछड़े पैदा होने की संभावना बराबर होती है। सेक्सड सीमेन तकनीक में, वीर्य के नमूने को एक विशेष प्रक्रिया से गुजारा जाता है, जिसे फ्लो साइटोमेट्री कहते हैं। इस प्रक्रिया में, लेजर लाइट और फ्लुओरेसेंट डाई का उपयोग करके X और Y गुणसूत्र वाले शुक्राणुओं की पहचान की जाती है। इसके बाद, वांछित लिंग गुणसूत्र वाले शुक्राणुओं को अलग कर लिया जाता है। डेयरी फार्मों में दूध उत्पादन के लिए मादा को प्राथमिकता दी जाती है। सेक...

बछड़े का ध्यान कैसे रखें और डेयरी का मुनाफा कैसे बढ़ाए

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  किसान भाइयों, डेयरी फार्मिंग में बछड़ियों और कटड़ियों का पालन अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। डेयरी फार्म की हानि और लाभ को बछड़ियां एवं कटड़ियां अत्यधिक प्रभावित करती हैं। इसलिए पशुपालकों को डेयरी फार्म में कुछ बातों का विशेष ध्यान देना चाहिए, जो बछड़ियों के जन्म से लेकर उनके जल्दी बड़े  होने तक के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में आप कुछ सावधानियों का ध्यान रखकर नवजात बछड़ियों/कटड़ियों की सही तरीके से देखभाल कर सकते हैं ताकि वे स्वस्थ और उत्पादक बन सकें। बछड़ी/कटड़ी के जन्म के समय: जब बछड़ी या कटड़ी जन्म लेती है, उसके नाल को काटते समय विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। नाल को काटने के लिए हमेशा नया ब्लेड इस्तेमाल करें और घर के चाकू का प्रयोग बिल्कुल न करें। नाल को 2.5 से 3 इंच छोड़कर काटें और उसमें बंद लगा दें। नाल को संक्रमण से बचाने के लिए 2 प्रतिशत टिंचर आयोडीन का घोल रखें और उसमें नाल के हिस्से को डुबो दें। यह प्रक्रिया दिन में दो बार दोहराएं। यह सावधानी नवजात बछड़ी को स्वस्थ रखने में मदद करेगी। ब्याने के बाद पहला दिन: नवजात बछड़ी या कटड़ी को जन्म के तुरंत बाद मां का दूध पिलाना चाहिए...

पशु का समय पर हीट में ना आना पशुपालन की एक बड़ी समस्या-समाधान

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पशुपालन में सही समय पर पशु का हीट में ना आना डेयरी किसानों के लिए एक बड़ी समस्या हैI जिसका समाधान सही समय पर न करने से किसानों को करोड़ों रुपये की हानि होती हैI ऐसे में अधिकतर किसानों  की लाख-डेढ़ लाख की भैंस कटान में चली जाती हैI  समाधान कैसे करें ? गाय/भैंस को प्रसव के समय यदि कोई बीमारी जैसे जेर रुकना, गर्भाशय का संक्रमण होना, प्रोलेप्स आदि हो जाता है तो तुरंत पशुचिकित्सक से पूरा इलाज कराना है अन्यथा पशु समय से न हीट में आयेगा और न ही समय से गर्भ धारण करेगा। पशु का प्रसव अगर ठीक तरह से सम्पन्न हो गया है तो भी किसान को गर्भाशय की सफाई (छटाव) के लिए यूटेरोटोन / युटरासेफ जैसी कोई भी बाजार में उपलब्ध दवाई ब्याने के बाद पहले 10 दिन तक पशु को पिलानी चाहिए। ऐसा नहीं करेंगे तो गर्भाशय में संक्रमण (इन्फेक्शन) हो सकता है। जिसके कारण पशु समय से हीट में नहीं आयेगा। गाय/भैंस के समय से हीट में आने के लिए ब्यांत के पहले दो -तीन माह काफी महत्वपूर्ण होते हैं। आपको इस दौरान पशु का वेट लास ( वजन की कमी ) नहीं होने देना है। इस काल मे अधिकतम दुग्ध उत्पादन होता है और पशु के शरीर से दूध के रुप में...

ब्रूसेला रोग से पशु धन में होने वाली बड़ी हानि और बचाव

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दुधारू पशुओं में ब्रूसेला न केवल आर्थिक हानि का कारण बनता है, बल्कि मानव स्वास्थ्य को भी इससे खतरा हैयह ब्लॉग पशुओं में ब्रूसेला के कारण होने वाले नुकसान, इसके लक्षण, बचाव के उपाय और रोकथाम के महत्व के बारे में है। ब्रूसेला बेक्टीरिया गर्भित पशु के प्लेसेंटा पर हमला करता है, जिससे गाय/भैंस में छठे महीने के बाद गर्भपात हो जाता है और पशु जेर नहीं डालता। ऐसे में फीटस (भ्रूण) गला सडा जैसा होता है। बाद में बांझपन और 10-15% दूध उत्पादन में कमी हो जाती है। जिससे किसानों को भारी आर्थिक हानि होती है। ब्रूसेला संक्रमण के बाद अगले गर्भधारण में देरी भी होती है। मानव स्वास्थ्य पर भी खतरा ब्रूसेला से स्त्री- पुरूष भी ग्रसित हो जाते हैं। यह एक तरह का पशुओं से मनुष्य को लगने वाला ज़ूनोटिक (पशुजन्य) रोग हैI मनुष्यों में यह बुखार,जोड़ों में दर्द, और पुरुषों में बांझपन का कारण बन सकता है। भारत में ब्रूसेला का प्रसार भारत में लगभग 12% पशुधन ब्रूसेला से संक्रमित हैं। बड़े डेयरी फार्म पर ब्रुसेला अधिक तेजी से फैलता है और डेयरी फार्म को बरबाद कर देता है। बचाव और रोकथाम  ब्रूसेला के खिलाफ बचाव में, हमें नि...

चना छिलका रातब में मिलाएं, पशु के लिए स्वादिष्ट आहार बनाएं

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अगर आप अपने पशु के लिए फाइबर एवं ऊर्जा का कोई बेहतर उपाय तलाश रहे हैं तो चना छिलका आपके लिए उत्तम विकल्प बन सकता है। इसे चना छिलका या चना छोलिया भी कहा जाता हैI चना छिलका प्रोटीन, फाइबर, और अन्य आवश्यक पोषक तत्वों से भरपूर होता है जो आपके पशुओं के स्वास्थ्य और विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं।  डेयरी किसान पशु के रातब में चने का छिलका इसलिए मिलाते हैं क्योंकि चने के छिलके के साथ दुधारू पशु रातब को पसंद करता है, चाव से खाता है। पसंदीदा चना छिलके के साथ पशु रातब और चारा  (भूसा, हरा चारा, साइलेज ) जो उसको खिलाया जाता है, को पेट भरकर खा लेता है। पशु पालक का पहला उद्देश्य होता है कि पशु पेट भर खा लेगा तो अधिक दूध देगा।  लेकिन होता क्या है कि अमूमन कई बार ऐसा रफेज (चारा,भूंसा, साइलेज) या दूसरा दाना देने पर जिसे पशु खाना पसंद नहीं करता। ऐसे में चना छिलका साथ में मिलाकर देने पर चने की महक सूंघकर पशु अन्य दाने को चाव से खा लेता है। चने का छिलका पानी में भिगोकर रखने से वो काफी फूल जाता है और देखने में रातब अधिक लगता है। पशु पालक इसे बाल्टी भरकर पशु को खिलाते हैं जिसे पशु चाव से खाता ह...